रविवार, 9 मई 2021

स्मृति और कल्पना

 


प्रायः अतीत की स्मृतियों में वृद्ध और भविष्य की कल्पनाओं में युवा और बालक खोए रहते हैं।वर्तमान ही वह महाकाल है जिसे साधे बिना और जिसमें समाहित हुए बिना यथार्थ के दर्शन नहीं हो सकते हैं। वर्त्तमान में रहना और वर्त्तमान को जीना ही अच्छे स्वास्थ्य और आत्मजागृति की निशानी है।प्रायः हम देखते हैं कि अधिकतर लोग स्मृतियों में गोते लगा रहे होते हैं।मैं ऐसा था, मैं वैसा था।मेरे साथ ऐसा हुआ, वैसा हुआ अगैरह वगैरह।और कुछ ऐसे भी होते हैं जो सदा स्वप्निल दुनिया में डूबे रहते हैं।मैं यह बनूंगा तो मैं वह बनूंगा।जो वृध्द होगए हैं,वे अपने अतीत की स्मृतियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं।हमारे समय में ऐसा होता था।हमने कितने कष्ट सहे हैं, कितने दुख भोगे हैं तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो।स्मृति और कल्पना से पार हुए बिना वर्त्तमान में समावेश पाना असंभव है। समस्त आध्यात्मिक प्रक्रिया में वर्तमान की महत्ता सर्वाधिक है।वर्तमान की स्वीकार्यता से ही अस्तित्व बोध होता है।

यह सच है कि स्मृति और कल्पना ऐसे दो तत्व हैं जो हमें वर्त्तमान में उपस्थित ही नहीं होने देते हैं।लेकिन स्मृति और कल्पना से पूर्व यदि हम सेल्फ़ अवेयरनेस को प्राथमिकता दे दें तो स्मृति और कल्पना हमारे लिए संजीवनी बूटी का काम कर सकती हैं।आत्मजगरुकता का अर्थ है अपने अनौखे अस्तित्व को स्वीकारना ।अस्तित्व की प्रकृति कभी भी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती है।अस्तित्व का अर्थ है सत्ता का भाव।किसकी सत्ता?चेतना की सत्ता।जहां भी संकल्प है,पुरुषार्थ है, परिणाम की अभिलाषा है, वहां-वहां चेतना है, जीवन का प्रवाह है।

जीवन के प्रवाह को सतत गतिमान बनाए रखने के लिए आवश्यक है अपनी कल्पनाशीलता के पंखों को उड़ान भरने में चेतनापूर्ण प्रयासों को भरपूर् आदर देना।।धरा पर कोई भी सुप्रसिद्ध रचना हकीकत में आने से पहले कल्पना में ही प्रस्फुटित होती है। कल्पना को पंख मिलते हैं स्वयं पर भरोसे करने से।स्वयं पर विश्वास के उदित होने में कल्पना की ऊर्जा प्रवाहित होती है।विश्वास भी तुरंत फुरन्त वाली प्रक्रिया नहीं है।कई अड़चनों और अवरोधों से गुजरने पर ही विश्वास की मरुभूमि उर्वरा हो पाती है।कल्पना का अर्थ है मानसिक रचना।इस मानसिक रचना को ही आज ब्लूप्रिंट कहा जाता है।किसी मूवी की डायरेक्टर हो या फिर किसी पुल का इंजीनियर, किसी दवा के बनाने वाले वैज्ञानिक हों या फिर कथा-उपन्यास के लेखक, कोर्ट में पैरवी करने वाले वकील हों या फिर बिल्डिंग का नक्शा तैयार करने वाले आर्किटेक्चर हों, चाहे फैशन डिजाइनर हों या फिर बड़े-बड़े स्पीकर,टीचर, प्रोफेसर,आर्टिस्ट- सभी को इमेजिनेशन की पॉवर पता है।

वस्तुतः कल्पनाशीलता ऐसी जादुई छड़ी है, जो हमें दुख में सुखी और सुख में दुःखी रखने की क्षमता रखती है।कल्पनाशीलता का अर्थ है भविष्य को वर्तमान की आंखों से तराशने की क्षमता।कल्पना भी एक तरह की प्रतिभा ही।कल्पना के पीछे स्मृतियों के संस्कार भी मौजूद रहते हैं।अतीत की अनुभूति की अपनी अहमियत है।अतीत की स्मृति भी कल्पना को पंख देती है।स्मृति में आपकी कल्पना के उदाहरणों की भरमार से यह मूल्यांकन तो हो गया होगा कि कैसे अपनी इस अनौखी शक्ति के बदौलत कई अनेकों मुश्किलों से मुक्ति मिली है।स्मृति स्वयं पर विश्वास का कारण सकती है।इसके विवेक की बहुत आवश्यकता है।

विवेक का मतलव है (Conscienc) अन्तरात्मा की आवाज ।जो आपको अंदर से सदा जागृत रखे ,आपका मार्गदर्शन करें।व्यक्ति सही-गलत,अच्छे-बुरे, सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय तथा यश-अपयश आदि द्वंद्वों से मुक्त कर स्वयं के अस्तित्व बोध की प्रकृति से परिचित हो सके। अपने अस्तित्व की अनुभूति का अर्थ है स्वयं की सत्ता को स्वीकारना ।

आज के धार्मिक क्रियाकलापों में ईश्वरीय सत्ता का उपदेश हद से ज्यादा सुनने को मिलता है, भले ही ईश्वर उन उपदेशकों से ईश्वर कोसों दूर क्यों न हो ?ईश्वरीय सत्ता से पहले यदि स्वयं के अस्तित्व का बोध नहीं हैतो फिर यह सब एक नशे जैसे ही है।वह सब पर थोपना चाहता है। जो मैं करता हूं ,वही ठीक है।अपने सिवा कोई भी उसे कोई भी ठीक नहीं जंचता है। सब में उसे खामियां ही खामियां नजर आती है।सबको सुधारने में लग जाता है।भूल जाता है कि उसके इस सुधारने के क्रम में वह टोंट कस रहा होता है।इसे लोगों को ठेस भी पंहुच रही है।सुधार से पहले वह स्वीकार हो। स्वीकार्यता का अर्थ है मानवीय गरिमा सर्वोपरि ।

-डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा 




 

 

शनिवार, 8 मई 2021

THE HOPE EXPERIMENT : आशा परमं ज्योतिः निराशा परमं तमः




हावर्ड
यूनिवर्सिटी के 
विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने 1950 के दशक में चूहों पर एक शोध किया था। कर्ट ने एक शीशे के जार  को पानी से पूरा भर दिया और उसमें एक चूहे को डाल दिया।चूहा उस पानी से भरे शीशे के जार में गिरते ही हड़-बड़ाने लगा था।चूहे ने जार से बाहर निकलने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। परंतु थोडे समय तक अपना पूरा जोर लगाने के बाद चूहे ने अपने हथियार डाल दिये थे और वह उसी जार में डूब कर मर गया।

कुछ समय के बाद कर्ट ने अपने शोध में थोड़ा-सा बदलाव किया।कर्ट ने एकबार फिर से पानी से भरे उस शीशे के जार में एक दूसरे चूहे को डाल दिया।वह चूहा भी उस शीशे के जार से बाहर आने के लिये बहुत ज़ोर लगाने लगा।लेकिन जैसे ही उस चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द किया तो वैसे हि वह चूहा उस जार में डूबने लगा।ठीक तभी कर्ट ने उस चूहे को जार से बाहर निकाल लिया।अगर कर्ट उस चूहे को जार से बाहर नहीं निकालते तो वह चूहा उसी जार में डूबकर  मर जाता।जार से बाहर निकालने का अर्थ है कि अब चूहा मौत के मुंह से बाहर आचुका था। कर्ट ने चूहे को बाहर निकाल कर उसे अपने हाथ से सहलाया। 

कर्ट ने कुछ समय तक उस चूहे को पानी से भरे शीशे के जार से दूर ही रखा,लेकिन थोड़ी देर के बाद उस चूहे को कर्ट पुनः उसी जार में फेंक दिया। पानी से भरे उस जार में दोबारा फेंके गए चूहे ने फिर से जार से बाहर निकलने के लिए अपनी भरपूर कोशिश शुरू कर दी।लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के बाद अब उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर कर्ट  स्वयं भी बहुत  हैरान हो रहे थे । 

कर्ट ने तो सोच था कि अब यह चूहा मुश्किल से पंद्रह-बीस  मिनट तक ही संघर्ष कर पाएगा और फिर उसकी अपनी शारीरिक क्षमता जवाब दे जाएगी।और वह उसी जार में डूब जायेगा।लेकिन जैसा कर्ट ने सोचा वैसा कुछ भी नहीं हुआ।चूहा जार में तैरता रहा और अपने जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।साठ घँटे तक चूहा पानी से भरे जार में अपने स्वयं को बचाने के लिये पूरी तत्परता से सँघर्ष करता रहा।

कर्ट यह सब देखकर बहुत ज्यादा आश्चर्य में पड़ गए थे।पहले वाला चूहा तो मात्र 15 मिनट में ही परिस्थितियों के सामने अपने  हथियार डाल चुका था ।जबकि  यह दूसरा चूहा साठ  घँटे से उन विषम परिस्थितियों से जूझ रहा था।वह किसी भी कीमत पर अपनी हार मानने को तैयार नहीं था।कर्ट ने अपने इस शोध क नाम"THE HOPE EXPERIMENT'रखा था।" HOPE = यानी आशा।

कर्ट ने अपने इस शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा कि जब उस चूहे को पहली बार जार में फेंका गया था तो वह डूबने की कगार पर पहुंच गया था । बस, उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया था।जिससे उसे नवजीवन मिल गया।उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का नवसंचार हो गया था।जिससे उसके अनुभव में जीवन के प्रति विश्वास के प्रबल भाव पैदा हो गए थे। उसके अंतर्मन में एक विश्वास बैठ गया था कि कोई  एक हाथ है,जो विकटतम परिस्थिति से उसे बाहर जरूर  निकालेगा।इसी प्रबल विश्वास के चलते ,जब उसे जार में फिर से फेंका गया तो वह साठ घंटे तक अनवरत संघर्ष करता रहा था।इस सबके पीछे कारण था एक ऐसे अनौखे हाथ के प्रति विश्वास, जिसने उसे विषम परिस्थिति में जीवनदान दिया था।वजह थी एक वह आशा।वजह थी एक वह उम्मीद जो उसे बड़े-से-बड़े संकट से जरूर बचाएगी  । 

जीवन में कैसी भी परीक्षा की घड़ी क्यों न आजाए, कैसी भी विपरीत परिस्थिति क्यों न आजाए,लेकिन कभी हार नहीं माननी चाहिए।भले ही सारी उम्मीदें खत्म होती नजर आरही हों, लेकिन तो भी उम्मीद बनाए रखनी चाहिए।उम्मीद की किरणों से ही हम सब समस्याओं को परास्त कर सकेंगे।साथ ही संघर्षों में विजेता बन कर उभर सकते हैं। कभी भी अपने सांसों की डोर को टूटने मत दीजिये।मन को हारने मत दीजिये।याद रखिए मन के हारे हार और मन के जीते जीत।जिस हाथ ने हमें इस पानी के जार में फेंका है।वही हाथ हमें इस पानी के जार से सकुशल वापिस निकाल भी लेगा।उस हाथ पर विश्वास रखिए।जिसने जीवन दिया है वही जीवन भी बचाएगा ।बस,इस विश्वास पर कायम रहिए कि आशा परमं ज्योतिः निराशा परमं तमः । 

-डॉ.कमलाकान्त बहुगुणा

 

गुरुवार, 6 मई 2021

सेवाशक्ति के आधार हैं हमारे दो चरण : पद्भ्यां शूद्रोSअजायत



पद्भ्यां शूद्रोSअजायत    
वैदिक परिभाषाएं सामान्य परिभाषाएं जैसी नहीं होती हैं।इन्हें समझने के लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता पड़ती है।द्विपद और चतुष्पद शब्द मनुष्य और पशु का संज्ञान कराते हैं।पद और पाद अंगवाची पैर के लिए प्रयुक्त होते हैं।मनुष्य को द्विपद इसलिए कहते हैं कि उसके दो पैर हैं।द्विपद में सभी तरह के मनुष्यों का अंतर्भाव है।पाद अर्थात् पैर की महत्ता अन्य शरीर के अंगों से कभी भी  कमतर नहीं आँकी जा सकती है।
पैरों की अपनी अनौखी विशेषता के कारण वैदिक परम्परा में चरणवंदना का बहुत महत्व है।शक्ति के केंद्र चरण होते हैं।रामायण युग से लेकर अद्यतन अंगद का पैर इसी शक्ति के भाव को प्रकट करता है।पैर यदि लड़खड़ाने लग जाएं तो फिर सर,हाथ आदि अंग भी शून्यता की तरफ बढ़ने लगते हैं।शरीर के संवाहक हैं हमारे दो चरण।इस संवाहकता के कारण गुरुपाद, पितृपाद, आचार्यपाद, चरणकमल, चरणारविन्द आदि पद सम्मानित माने जाते हैं।वैदिक साहित्य में अभिवादन के समय चरणस्पर्श की महत्ता बहुत अधिक है।कभी भी कोई चरणस्पर्श की जगह शिरस्पर्श नहीं करते हैं।सामाजिक व्यवहार में पाद  शब्द चतुर्थांश को भी व्यक्त करता है।
मानवसंस्कृति के एक चौथाई का प्रतिनिधित्व करते हैं  सेवाशक्ति से सम्पन्न ये चरण।शूद्र सेवाशक्ति से संपन्न है।शूद्र सेवा से अपनी जीविका चलाते हैं।चार शक्तियां हैं - एक ज्ञान की,दूसरी बल की,तीसरी संग्रह की और चौथी सेवा की।सेवा की महत्ता किसी से छुपी नहीं है-सेवाधर्म: परमगहनः।मनु ने सेवा की ओर संकेत किया है-वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार- शिल्पैर्वा विविधैः जीवेत् द्विजातिहितमाचरन्।शिल्पविद्या भी शूद्रों की शक्ति मानी जाती थी।
जब भी हम शुद्र को अधम मानेंगे तभी हम  मानवीयगरिमा से रहित हो जाएंगे और समाज की दुर्गति के भी कारण बनेंगे।जो यह मानते हैं कि शूद्र व्यक्तित्वविकास व अध्ययन की तरफ गतिमान नहीं होते हैं, उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है।वे टस से मस नहीं होते हैं जड़ता दिखाने में।वे मूढ़ हैं, वे शूद्र कहलाते हैं।वास्तव में यह सोच बिल्कुल गलत है।जो भी शूद्र को मूर्ख और मूढ़ मानता है,वास्तव में वह मानवीय-गरिमापूर्ण व्यवहार से स्वयं को वंचित कर रहा होता है।शूद्र को मूर्ख कहना बिल्कुल गलत है,अशास्त्रीय और अमर्यादित भी।यजुर्वेद का ऋषि स्वयं इसमें प्रमाण है- यथेमां वाचं कल्याणीमावदानिजनेभ्यः। ब्राह्मणराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय।।
वेद का ज्ञान (शिक्षा)बिना किसी भेदभाव के सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है।ऋषि शूद्र को साक्षात संबोधित कर रहा है। ज्ञान से इन्हें वंचित रखना और दुराग्रह से इन्हें मूढ़ या मूर्ख मानना मानवता पर कुत्सित प्रहार है।सत्य तो यह है कि मूर्खता तो किसी भी वर्ण के व्यक्ति में देखी जा सकती है।किंवदंती है कि एकबार एक माँ  जब अपने पुत्र को खाने के लिए थाली में गर्म खीर परोसती है तो उसका पुत्र खीर खाने के लिए जल्दी से थाली के बीच में जैसे ही अपना हाथ डालता है तो उसका हाथ जल जाता है।पास बैठी मां ने जब उसका हाथ जलता देखा तो उससे सहा नहीं गया और उसने अपने बेटे से कहा- बेटा! तू तो चाणक्य जैसी मूर्खता कर रहा है।चाणक्य भी तेरे जैसे ही जल्दी-जल्दी के चक्कर में अपने शत्रुओं के बीच में ही हमला कर रहा है। उसे किनारे से हमला शुरू करना चाहिए,वहां शत्रु निष्क्रिय होता है। बेटा! तू पहले किनारे से खाना शुरू कर।वहां  बीच की अपेक्षा  खीर जल्दी ठंडी हो जाती है।ऐसा करने से फिर न तो तेरा हाथ ही जलेगा और नहीं मुख।कहते हैं कि मां-बेटे के इस संवाद को सुनकर ही चाणक्य को योजनाबद्ध तरीकों से शत्रु को पराजित करने के लिए सफल रणनीति बनाने का ब्लूप्रिंट (रहस्य)मिला था।
सेवाशक्ति और मानवता के आधार स्तम्भ हैं शूद्र।शूद्र को वैदिक संस्कृति में निम्न नहीं समझा जाता है।मृच्छकटिकम् में तो राजा का नाम ही शूद्रक था।समाज में व्यवस्था चाहे कर्म आधारित वर्णविभाजन की हो या फिर जाति  आधारित कर्म की।जब भी कोई शब्द सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त कर अस्पृश्यता बढ़ावा देता है तो समाज उससे स्वतः दूरी बनाने लगता है।
आज के समय में शूद्र शब्द बहुत ही गर्हित अर्थ में माना जाने लगा है।आज 
शायद ही कोई व्यक्ति स्वयं को शूद्र कहलाना पसंद करे।आधुनिक समाजवैज्ञानिकों ने तभी तो वर्तमान संदर्भ के मद्देनजर दलित शब्द को गढ़ा है। यद्यपि दलित शब्द से शोषित व  वंचितवर्ग का अवगाहन होता है।इस वर्ग के हुए शोषण को कदापि विस्मृत नहीं किया जा सकता है।लेकिन शोषण और वंचितसमुदायों में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग न स्वीकारना भी अनुचित है।
वस्तुतः वैदिकपरम्परा में पुष्पदल और तुलसीदल बहुत ही सम्मानित प्रयोग है। जो दल पुष्पों से बिछुड़ गया हो ,टूट गया हो।ठीक, इसी तरह से जिस समूह को सामाजिक समरसता से वंचित कर दिया गया हो,उसे ही आधुनिककाल में दलितरूप में परिभाषित किया गया है।दलितविमर्श के साथ ही स्वयं को आभिजात्यवर्ग से सम्मानित मनाने वाले लेखकों और विचारकों के लिए निम्नप्रदत्त अवधारणा अवश्य विवेचनीय है-नाविशेषोSस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत्।ब्रह्मणा पूर्वसृष्टा हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ।।
ईश्वर ने सभी मनुष्यों को ब्राह्मण के समान ही उत्पन्न किया है।लेकिन अपने भिन्न-भिन्न कर्मो ने ही वे विभिन्न वर्णों में विभाजित हुए हैं।साहस कर्म वाले लोग ब्राह्मणवर्ण से क्षत्रिय,व्यापार के प्रति झुकाव वाले ब्राह्मणवर्ण से वैश्य तथा सेवा में रुचि रखने लोग ब्राह्मणवर्ण से ही शूद्र  बने हैं।शायद इसीलिए अत्रि स्मृति में कहा गया है- जन्मन: जायते विप्र: संस्काराद्द्विज उच्यते।
                                                                                                                         -डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा



बुधवार, 5 मई 2021

धरना समाधान नहीं, नौटंकी है



जब शत्रु सारी मर्यादाएं लांघ जाए तो फिर युद्ध नैतिकता के साथ नहीं लड़ा जा सकता है।इतिहास  पृथ्वीराज जैसी मूर्खताओं को  कब तक स्मरण  करता रहेगा। भगवान श्रीकृष्ण ,आचार्य चाणक्य और वीर शिवाजी जैसी नीतियां ही ऐसे समय में अनुकरणीय होनी चाहिए।इस समय धरना-प्रदर्शन समाधान  नहीं हो सकता है। इन TMC के गुंडों को जमकर धरना पड़ेगा ,यही एक मात्र समाधान है। आपने उनका  नामक खाया है। धरने देने से नमक का कर्ज नहीं चुकता साहब ,उनकी रक्षा के लिए  लिये चाहे  अपने प्राणों की आहुति क्यों  देनी पड़े तो भी उनके साथ वहां खड़े होइए । धरने से आपकी कजरी जैसी नोटंकी लग रही है। माफ करना अगर बुरा लग रहा हो तो। पर सच तो कहना  भी पड़ेगा और आपको सुनना तथा सहन  भी करना होगा।
कार्यकर्ता के लिए प्रशंसा के बोल तभी तक मायने रखते हैं, जब तक वह अंतर्मन को आह्लादित करते हैं। लेकिन जब उनके प्राण संकट में हो तब प्रशंसा के बोल जहर जैसे चुभते हैं।काश !TMC के गुंडो द्वारा मारे जा रहे कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दे पाते। गरीबों के घर तो  खाना खाने की फोटो BJP के बड़े-बड़े नेता खूब खिंचवा रहे थे लेकिन वह समय कब  आएगा जब ये बड़े-बड़े नेता उन गरीबों को अपने महल में खाना खिलाते हुए फोटो खिंचवाएँगे? क्या कभी ऐसे दिन आएंगे।बेचारे बंगाल के कार्यकर्ताओं की जान की सुध लेगा कोई?
TMCवालों ने तो खेला शुरू भी कर दिया है। 43 BJP आफिस को आग लगा दी गई।सौ BJP बूथ वर्कर के घर जला दिए गए ।BJP समर्थकों के बड़े बड़े शोरूम, कलकत्ता पुलिस के सहयोग से लूट लिए गए ।बहुत  से  लोग असम के लिए पलायन कर चुके हैं।सुवेन्दु अधिकारी  पर  हमला किया गया।देवदत्ता के घर को जला दिया गया।BJP के  कार्यकर्ताओं को मार दिया गया।तभी तो ममता दीदी कहती रही कि खेला खेलबो उसका यही तो खेला था ।कार्यकर्ताओं के मरने और  बलात्कार के बाद भी खून नहीं खोल रहा है मोदी और शाह का तो क्या अर्थ निकालें इससे? यदि यही सब  मोदी और शाह की बेटियों के साथ होता तो भी इसी तरह धरना देने की नौटंकी करते क्या?ऐसा लग रहा है कि साहब नोबेल पुरस्कार की दौड़ में शामिल होना चाहते हैं।
सच बात तो यह है कि BJP को अपने कार्यकर्ताओं की जान की परवाह कभी  नहीं रही है। सबको पता था चुनाव  के बाद TMC के गुंडे यही करेंगे। जब कार्यकर्ता ही मर जाएंगे तो फिर ऐसी पार्टी को सपोर्ट ही क्यों कोई करे ,जो हमारे जानमाल  की परवाह ही न कर सके, उस पार्टी को वोट क्यों दें?मोदी और शाह भगवान नहीं हैं।इन्हें चेतावनी देकर जगाना जरूरी है। 
जो पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को मरने के लिए छोड़ दे उसे मौन होकर सहने से क्या लाभ। लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बाद भी कुछ न कर सके तो फिर उसे फटकारना भी जरूरी है। मोदी और शाह को भी जबाब देना  होगा कि आखिर बंगाल के लोगों ने  अपनी जान हथेली पर रखकर आपके भरोसे ही वोट दिया था , लेकिन अब BJP वाले धरना-धरना खेल रहे हैं । धिक्कार है ऐसे छप्पन इंच की छाती वाले को।हमारा इतिहास गवाह है कि बलि बकरे की ही दी जाती है ,शेर की  कभी नहीं।इसलिए सिंह बनो सिंह। बकरी जैसे मिमियाते रहोगे तो बलि के बकरे  ही समझे जाओगे।
                                                                                                        -डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा

मंगलवार, 4 मई 2021

धारणा नहीं संभावना को तलाशें



बहुत सालों तक शिक्षण प्रोफेशन से जुड़ा रहा हूं।उस समय की एक घटना  का ज़िक्र करना जरूरी समझ रहा हूं।विद्यालय में एक डांस टीचर के साथ कुछ ऐसा घटित होता है, जो कभी भी किसी भी टीचर के साथ घटित नहीं होना चाहिए।एकदिन जब वह किसी कॉम्पटीशन के लिए बच्चों की तैयारी करा रहे थे तो विद्यालय के कुछ बच्चे खिड़कियों के पीछे छिपकर लड़कियों का डांस देख रहे थे।अब विद्यालय में अनुशासन बनाए रखना हर शिक्षक की जिम्मेदारी होती  है।यूं तो लड़कियों का डांस देखने में कुछ भी गलत नहीं है।क्योंकि वे आज डांस सीख रही हैं तो कल अपनी प्रस्तुति देंगी ही।लेकिन हर चीज का एक खास समय होता है और एक खास स्थान भी।इस तरह की समग्र अवस्था का सचेतन बोध कराता है मर्यादा शब्द ।मर्यादा को ही लक्ष्मण रेखा कहते हैं।यदि मर्यादा टूटेंगी तो उससे मिलने वाले परिणाम दर्द भरे घाव जरूर देंगे।

कई बार हम यथार्थ की बजाय वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं।यही धारणा कहलाती है।जैसे ही डांसटीचर ने डांसरूम का गेट खोला तो वहां से तभी एक सीनियर क्लास का छात्र गुजर रहा था।वह डांस देखने वालों में शामिल था भी यह नहीं ,इसकी विवेचना किए बिना डांसटीचर ने उसे देखते ही कुछ पूछे बिना ही उसके कॉलर पकड़कर क्लासरूम के अंदर ले आए और लड़कियों के सामने ही उसे दो-चार थप्पड़ जड़ दिए।आकस्मिक पिटाई से व्यथित उस लड़के ने पूछा- सर मुझे क्यों पीटा है आपने?उसके प्रश्न करने पर डांसटीचर ने उसे दुबारा पीटना शुरू कर दिया।अब लड़कियों के सामने इस अकारण पिटाई से व्याकुल छात्र ने भी डांसटीचर के हाथ पकड़ लिए।इस पकड़म्पकड़ाई में डांसटीचर जमीन पर गिर जाते हैं।जैसे कुछ बड़े छात्रों को यह पता लगता है तो उनमें से कोई ए.ओ.ऑफिस से माइक से अनाउसमेंट कर देता है कि डांस सर की पिटाई हो गई है।पूरे विद्यालय में यह बात आग की तरह फैल गई।

विद्यालय की महिला प्रिंसीपल ने नियमों का हवाला देते हुए उन डांस टीचर से क्षमा याचना के लिए कहा।प्रिंसीपल भी नियम के अनुसार ही यह कह रही थी।अब उस छात्र के पैरेंट्स को स्कूल में बुलाया गया।उसके पिता ने स्कूलऑफिस में पंहुचते ही हंगामा खड़ा करना शुरू कर दिया।अपशब्दों के साथ ही टीचर को जेल भेजने की धमकी भी देने लगे।

नियम भी यही है।पिता के इस व्यवहार से उस छात्र का हौंसला भी बढने लगा।मेरे पिता की हैसियत के सामने स्कूल नाकाफ़ी है।डांसटीचर को न चाहते हुए भी समय की हकीकत को भांपते  हुए उन पैरेंट्स से अन्ततः क्षमा मांगनी ही पड़ी।बस, अब कुछ सालों के बाद पिता को पछताते हुए देखा है हमने।अगर इस पूरे घटनाक्रम का सिल-सिलेबार विवेचना की जाए तो एक बात साफ समझ में आरही है कि कोई भी अपनी भूमिका से समाधान के हिस्से  नहीं बन पाए थे।सब के सब रेडीमेड  समाधान की स्क्रिप्ट लिए अपनी-अपनी भूमिका अनुसार डटे हुए थे।

डांसटीचर स्मृति में पड़े तरीकों द्वारा संचालित मानस से धारणा गढ़ कर ही सबक सिखाने वाली प्रवृत्ति के साथ बच्चे से उलझे थे।छात्र भी लड़कियों के सामने अपनी पिटाई से अपमान के अहसास से ही टीचर से उलझा था।प्रिंसीपल ने भी नेतृत्व वाले गुणों की बजाय प्रबंधन पर ज्यादा फोकस किया था।पिता भी उत्तेजना में आकर बालक को सर चढ़ा गया।और आज वह छात्र भी पछता रहा है और उसके मां-बाप भी।किसी ने भी अपने अनौखपन के साथ मानवीय गरिमा की संभावना पर फोकस नहीं किया था।आखिर करते भी कैसे?भय ने सबको जड़ जो कर दिया था।शिक्षा के केंद्र में चेतना का सर्वथा अभाव भविष्य निर्माण की प्रक्रिया में सबसे अधिक चुनौती है।।हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचकर दूसरे के अपराध के मूल्यांकन के समय स्वयं के लिए वकील जैसा रवैया और दूसरों के लिए जज बन कर खड़े हो जाते हैं।

दो योग्यताएं विकसित करना बहुत अनिवार्य है।एक लीडरशिप की योग्यता और दूसरी मैनेजमेंट की योग्यता।ये दोनों कलाएं एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी हमेशा एक-दूसरे के पूरक हैं।इनमें अंतर समझना बहुत जरूरी है।नेतृत्व के मायने सही काम करने से है और प्रबंधन से तात्पर्य है सही से काम करना।दरअसल जब तक सही काम का निश्चय नहीं होगा, तब तक सही से काम करना केवल ऊर्जा की बर्बादी के अलावा और कुछ भी नहीं है।

लीडरशिप करुणा से भरपूर होनी चाहिए, तभी सृजन श्रेष्ठ होगा।विनम्रता और वात्सल्यता लीडरशिप की शक्ति भी है और पहचान भी।यदि नाविक ही पतवार खेने की अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करेगा तो फिर नाव पर सवार लोगों का भविष्य खतरे में पड़ने से कौन रोक सकेगा? लीडर डर दिखाकर नहीं बल्कि प्यार लुटा कर ही टीम में सबको जोड़े रख सकता है।टीम का हर सदस्य उसके परिवार का सदस्य है। परिवार के किसी भी सदस्य पर आई विपत्ति से भला  वह मुंह कैसे मोड़ सकता है?जब उनका दर्द उसे अपना लगेगा और कोशिश करेगा कि  इस दर्द से उन्हें बाहर निकाला जाए,तभी वह सही अर्थों में लीडर कहलाता है। लीक से हटकर सोचने की योग्यता ही अच्छे लीडर पैदा करती है।जब भी सिस्टम पर कॉपी पेस्ट की स्क्रिप्टिड सोच वाले लोग बैठे होंगे तो नतीजे भी स्क्रिप्टिड जैसे ही  मिलेंगे।

-डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा



लीडरशिप और मैनेजमेंट

दो योग्यताएं विकसित करना बहुत अनिवार्य है।एक लीडरशिप की योग्यता और दूसरी मैनेजमेंट की योग्यता।ये दोनों कलाएं एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी हमेशा एक-दूसरे के पूरक हैं।इनमें अंतर समझना बहुत जरूरी है।नेतृत्व के मायने सही काम करने से है और प्रबंधन से तात्पर्य है सही से काम करना।दरअसल जब तक सही काम का निश्चय नहीं होगा, तब तक सही से काम करना केवल ऊर्जा की बर्बादी के अलावा और कुछ भी नहीं है।

लीडरशिप करुणा से भरपूर होनी चाहिए।तभी सृजन श्रेष्ठ होगा।विनम्रता और वात्सल्यता लीडरशिप की शक्ति भी है और पहचान भी।लीडर किस भी विकट समस्या में क्यों न हो उसे अपनी टीम के प्रति नकारात्मक  रवैया निर्मित नहीं करना चाहिए।यदि नाविक ही पतवार खेने की अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करेगा तो फिर नाव पर सवार लोगों का भविष्य खतरे में पड़ने से कौन रोक सकेगा? लीडर डर दिखाकर नहीं बल्कि प्यार लुटा कर ही टीम में सबको जोड़े रख सकता है।टीम का हर सदस्य उसके परिवार का सदस्य है। परिवार के किसी भी सदस्य पर आई विपत्ति से भला  वह मुंह कैसे मोड़ सकता है?उसका दर्द उसे अपना ही लगेगा।कोशिश करेगा कि कैसे इस दर्द से उसे बाहर निकाला जाए।
अफ़सोस है कि अधिकांश लोग आज वात्सल्यता की जगह मैनेजमेंट वाले गुण अर्थात् दूसरों पर नियंत्रण में अधिक अपनी ऊर्जा खपत कर रहे हैं।आज बड़ी से बड़ी लीडरशिप को आपा खोते हुए बहुत आसानी से देखा जा सकता है।लेकिन लीक से हटकर सोचने की योग्यता ही अच्छे लीडर पैदा करती है।जब भी सिस्टम पर कॉपी पेस्ट की स्क्रिप्टिड सोच वाले बैठे होंगे तो नतीजे भी स्क्रिप्ट जैसी ही मिलेंगे।कईबार बड़ी-बड़ी इमारतों के बनाने में मस्त और व्यस्त रहने वाले लोग इतने बेफिक्र नजर आते हैं कि नींव की परवाह ही नहीं करते हैं।जबकि हर इमारत की उम्र का रहस्य उसकी नींव में छिपा रहता है।बहुत बार लंबे समय से बीज बोए बिना फसल काटने के कारण शायद हम भूल ही चुके हैं कि बोना भी जरूरी है।
इमर्सन ने कहा था था-कि आप क्या हैं इसकी आवाज आवाज मेरे कानों इतनी तेजी से सुनाई देती है कि आप क्या कहते हैं मुझे सुनाई ही नहीं देता है।शब्दों और व्यवहार की अपेक्षा चरित्र की उच्चता को पैरेडाइम कहते हैं।दिल और दिमाग की सहभागिता जब चरित्र से प्रवाहित होती है तो भले ही कोई इंसान संवाद में कुशल और मानवीय सम्बन्धों की तकनीकी को न समझता हो लेकिन उसकी विश्वसनीयता में जीवन के सभी मूल्य प्रतिभासित होते हैं।क्योंकि चरित्र की आवाज ऊंचे स्वर में होती है।
-डॉ.कमलाकान्त बहुगुणा



 
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रविवार, 2 मई 2021

समाधान की खोज में



बात बहुत बचपन की है।तब शायद मैं दूसरी या तीसरी क्लास में पढ़ने वाला छात्र रहा होऊंगा।मेरी और मुझसे बड़े भाई की प्रारंभिक शिक्षा पिताजी की देख-रेख में हुई थी।पिताजी तब के अखंड  उत्तरप्रदेश और आज के  उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के सरकारी स्कूल में  हैडमास्टर  थे।पिताजी का वर्चस्व विद्यालय और घर दोनों ही जगहों पर पूरी हनक के साथ विद्यमान था।मैं और मुझसे बड़ा भाई परिवार से अलग पिताजी के साथ ही रहते थे।हम दोनों भाइयों की सारी जिम्मेदारी पिताजी की ही थी।मां दादी के साथ गांव में खेतीबाड़ी के साथ-साथ गाय-बेलों और घर की देखभाल भी किया करती थी।

एकबार की बात है कि रोजाना की तरह दूधिया सुबह-सुबह हमारे क्वार्टर के दरवाजे पर रखे  बड़े-से लोटे में दूध डाल कर चला गया था।उसके जाने के कुछ समय के बाद मैं जैसे ही सुबह -सुबह अपने बिस्तर से  सोकर उठा तो वैसे ही अपनी अधखुली आंखों को अपने दोनों हाथों से मलता हुआ दरवाजे  की तरफ जाने लगा।जैसे ही मैं दरवाजे पर पंहुचा तो वैसे ही फ़र्श पर  रखे दूध से भरे लोटे पर मेरा पैर लग गया । मेरे पैर के लगते ही दूध का लोटा जमीन पर लुढ़क गया और सारा का सारा  दूध जमीन पर फैल गया।अब पिताजी द्वारा मेरी बहुत  पिटाई होगी, इस डर से मुझ में अंदर ही अंदर बहुत कंपकंपी छूटने लगी थी।मुझे तब कुछ सूझ भी नहीं रहा था कि आखिर मैं अब करूं तो करूं क्या? इसी डर   से  मैं अपने बचने के उपायों पर गौर करता हुआ दुबारा से अपने बिस्तर पर सो गया ।नींद तो अब आनी ही कहां से  थी। लेकिन अपनी  सांसें  थामे सोने का नाटक जरूर  करने लगा।

बस,कुछ ही देर के बाद  मुझे पिताजी  के घर के अंदर प्रवेश करने की आहट  सुनाई दी। वे जमीन पर दूध के लोटे को लुढ़का हुआ देखकर  गुस्से में तिलमिलाते हुए बोलने लगे कि तुम देर तक सोते रहते हो, इसलिए बिल्ली दूध पी गई और बचे हुए दूध को फैलाकर भी चली गई है।मैं भी अनजान-सा भाव लिए तथा अंदर ही अंदर पिटाई से बच गया हूँ इस आंतरिक आश्वासन के साथ राहत भरी सांस लेने लगा था।यद्यपि उस समय की मेरी समग्र प्रतिक्रिया का उद्दीपन भय ही रहा था और अभीष्ट उद्देश्य भी था गैरइरादतन अपराध के दंड से मुक्ति पाने का उपाय ढूंढना।परंतु कईबार हमारे दिलोदिमाग में सामाजिक दर्पण से प्रतिबिम्बित प्रतिक्रिया परिस्थितियों के अनुसार प्रकट हो जाया करती हैं।उस समय  मानस में प्रकट हुई नादानियों ने अपनी समझ व स्तर के अनुरूप निदान ढूंढ लिया था।आज भले ही वह निदान जीवनमूल्यों से किसी भी तरह से मेल खाता न दिखे ,लेकिन उस समय उसने मुझे और मेरे अंतर्मन को बहुत अधिक राहत का अहसास तो कराया ही था।

आज भी जब वह स्मृति मेरे मानस में उभरती है तो एक बात अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि जीवन में चाहे कैसी भी समस्या क्यों न आ जाए,लेकिन उनसे न तो घबराना चाहिए और नहीं उनसे पलायन करना चाहिए।उनका सामना करने का अर्थ है,स्वयं उनके समाधान की खोज में निकल पड़ना।समाधान के प्रति हमारी तीव्रतम व्याकुलता हमारे अस्तित्व की परम पहचान है।हमारी व्याकुलता सचेतन प्रयास की उद्गमस्थली है।अंदर से यह अनुभूति चरम पर हो कि मैं हूँ न।मैं हूँ न का यह आत्मिक संवाद हमें समाधान का सारथी बनाकर ही छोड़ेगा।यही संवाद आत्मजागृति (Self Awareness) के बीज भी अंकुरित करता है।                                                      

                                                                   डॉ.कमलाकान्त बहुगुणा 



शनिवार, 1 मई 2021

रत्ती भर की चींटी का पहाड़ जैसा साहस




मनुष्य का जीवन सदा गतिमान है।हमारे जीवन की राह चाहे आसान हो या फिर कठिन।इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । अंतर लाने के लिए हमें हमेशा आगे बढ़ते रहना होगा।हमारे पास सबसे अच्छा विकल्प भी यही है।दृढ़ आत्मविश्वास से भरपूर होने पर ही हमारी राह आसानी से मंजिल तक पंहुच पाती है।प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबॉलर जो नामक ने कहा था जब आपके अंदर आत्मविश्वास होता है तब आप जीवन का खूब आनंद उठा सकते हैं और फिर आप अद्भुत निर्माण कर सकते हैं। 
आत्मविश्वास और उम्मीद हमारी आंतरिक सुरक्षा के कवच हैं।उत्साह-उमंग से जीवन जीने की भावना का अर्थ है कि गतिमान जीवन को अंतर्मन से स्वीकार करना है।स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था कि किसी दिन जब आपके सामने कोई समस्या न आए तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि अब आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।परिस्थिति चाहे कितने भी कठिन क्यों न हो,लेकिन उससे घबराना कभी समाधान नहीं हो सकता है।समस्या से भागने की कोशिश बताती है कि आप में आत्मविश्वास और आशा का अभाव है।समस्या का डटकर मुकाबले के लिए खुद पर भरोसा होना बहुत आवश्यक है।स्वयं पर विश्वास मात्र से आपके अंदर सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है।आप पॉजिटिव एनर्जी से भर जाते हैं। 
जीवन में सदा स्वस्थ,उत्साहित और ऊर्जावान बने रहने के लिए उम्मीदों का साथ होना अनिवार्य है।मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा है हमें सीमित निराशा को तो स्वीकार करना चाहिए परंतु अनंत उम्मीदों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।जीवन में कुंठा उत्पन्न होने के पीछे है हमारी अपेक्षाएं।हमारी अपेक्षाएं जब जीवनमूल्यों और प्राथमिकताओं के बजाय सामाजिकदर्पण से प्रतिबिंबित होती हैं।रत्ती भर की चींटी का पहाड़ जैसा साहस हम सबके मनोबल को बढ़ाता है।
कभी समय मिले तो चींटी को जरूर देखें।उनसे जीवन के रहस्य को सुलझाने वाले महत्वपूर्ण सूत्रों से परिचय मिलता है।चींटियां कभी किसी परिस्थिति की गुलाम नहीं होती हैं।हर परिस्थिति में स्वयं को निखारती है।किसी भी तरह की रुकावट उसके लिए अवरोध नहीं बन सकती है।वह उन रूकावटों को घूमकर, नीचे से या ऊपर से पार जरूर करती है।वह कभी परिस्थितियों का रोना लेकर नहीं बैठती है।हार न मानने का स्वभाव होता है चींटियों का।लक्ष्य पर नजर सदा गड़ाए रखती है । 
विजेता के लिए अनिवार्य शर्त है युद्ध के मैदान से पलायन न करना।मैदान छोड़कर भागने वाले कभी जीत नहीं सकते हैं।चींटियों में योजना को क्रियान्वित करने की अनोखी कला होती है।गर्मियों में सर्दियों की योजना बनाना उनकी विलक्षण प्रतिभा की पहचान है।धैर्य की अद्भुत खजाना है ये चीटियां।जब सर्दी होती है तो वह धैर्यता से गर्मी की प्रतीक्षा करती है।चीटियां परिणाम के प्रति सदा प्रयत्नशील रहती हैं। वे अपने काम को पूरा करने के लिए सदा कटिबद्ध रहती हैं।पूरे मनोयोग से अपने कार्य को अंतिम अंजाम तक पहुंचाती हैं।वे कभी भी व्यर्थ में अपनी ऊर्जा व्यय नहीं करती हैं। 
चीटियां सदा समूह में काम करती हैं।समूह यानी साझा शक्ति।साझा शक्ति का उपयोग यानी अधिक अच्छे परिणाम को हासिल करने की कला यह ।परस्परनिर्भरता के महत्व का सम्यक ज्ञान।समूह में मिलकर बांबिया बना लेती हैं।चींटियों की ये बांबिया इंजीनियरिंग के अद्भुत उदाहरण हैं।इन बाँबियों के अंदर हवा आने-जाने तक का विशेष ख्याल रखा जाता है।चींटियों की विशेष पहचान होती है कि वे अपने नेता द्वारा बताए गए रास्ते पर विनम्रता से चलती हैं।विनम्रता शक्ति है अपने अस्तित्व की प्रकृति से परिचित होने में। 
चीटियां श्रृंखलाबद्ध होकर चलती हैं। चींटियों की शृंखला परस्पर तालमेल का अद्भुत नजारा है।वे सदैव एक-दूसरे के मार्गदर्शक की भूमिका में रहती हैं।यह बेहतरीन नेटवर्किंग का शानदार उदाहरण है।चीटियों से हमें सीख मिलती है कि हम परिस्थितियों के गुलाम नहीं बनें।लक्ष्य पर हमारी सदा दृष्टि हो।हम युद्ध से पलायन नहींकरें, योजना का क्रियान्वयन की अनोखी कला होती है।परिणाम के प्रति हम अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते हैं।व्यर्थ में हमें अपनी ऊर्जा का क्षय नहीं करना चाहिए। हम समूह में विनम्रतापूर्वक नेतृत्व का अनुसरण करते हुए अपने काम को अंजाम तक पँहुचना चाहिए।                                                       
                                         -डॉ.कमलाकान्त बहुगुणा



सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु

स्मृति और कल्पना

  प्रायः अतीत की स्मृतियों में वृद्ध और भविष्य की कल्पनाओं में  युवा और  बालक खोए रहते हैं।वर्तमान ही वह महाकाल है जिसे स...