मंगलवार, 4 नवंबर 2025

 

Reduce Stress with Vedic Techniques | वैदिक तकनीकों से तनाव घटाने के प्राचीन उपाय



आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में तनाव (Stress) हर उम्र के व्यक्ति की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
चाहे आप छात्र हों, प्रोफेशनल हों या गृहस्थ — मानसिक दबाव, चिंता और बेचैनी धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा को खत्म कर देते हैं।

लेकिन भारत की वैदिक परंपरा में ऐसे अद्भुत उपाय बताए गए हैं जो मन, शरीर और आत्मा — तीनों को संतुलित कर तनाव को स्वाभाविक रूप से कम करते हैं।

🕉️ 1. वैदिक दृष्टि में तनाव क्या है?

वैदिक ग्रंथों के अनुसार, तनाव तब उत्पन्न होता है जब मन वर्तमान क्षण से हटकर अतीत या भविष्य में भटकता है।

👉 पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है:
योगश्चित्तवृत्ति निरोधः”
अर्थात — योग वह अवस्था है जिसमें मन की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं।

🌿 2. तनाव दूर करने के प्रभावी वैदिक उपाय

🔹 (a) प्राणायाम – श्वास से शांति की यात्रा

प्राणायाम का अर्थ है — प्राण (जीवन ऊर्जा) का विस्तार।

✔️ लाभ:

  • तनाव हार्मोन (Cortisol) कम होता है
  • मन तुरंत शांत होता है
  • नींद की गुणवत्ता बढ़ती है

✔️ प्रमुख प्राणायाम:

  • अनुलोम-विलोममन को शुद्ध करता है
  • भ्रामरीनकारात्मक विचार शांत करता है
  • नाड़ी शोधनऊर्जा संतुलित करता है

👉 वैज्ञानिक रूप से यह मस्तिष्क में Serotonin और Dopamine बढ़ाता है।


🔹 (b) ध्यान (Meditation) – मन की गहराई में उतरना

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ध्यान मानसिक शांति और आत्म-जागरूकता का सबसे शक्तिशाली साधन है।

✔️ कैसे करें:

  • शांत स्थान चुनें
  • रीढ़ सीधी रखें
  • आँखें बंद करें
  • श्वास पर ध्यान केंद्रित करें

✔️ लाभ:

  • तनाव और चिंता कम
  • फोकस और स्मरण शक्ति बढ़े
  • भावनात्मक संतुलन बेहतर

🔹 (c) वैदिक मंत्र – ध्वनि की उपचार शक्ति

मंत्र केवल धार्मिक नहीं, बल्कि Sound Therapy हैं।

✔️ प्रमुख मंत्र:

  • ॐ नमः शिवायमन को स्थिर करता है
  • ॐ शांति शांति शांतिगहरी शांति देता है
  • गायत्री मंत्र चेतना को प्रकाशित करता है

✔️ अभ्यास:

  • रोज़ 108 बार जप करें
  • ध्वनि की कंपन को महसूस करें

🔹 (d) सात्त्विक आहार – जैसा भोजन, वैसा मन

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✔️ क्या खाएं:

  • ताज़ा फल, सब्ज़ियाँ
  • अंकुरित अनाज
  • दूध और हल्का भोजन

✔️ क्या न खाएं:

  • जंक फूड
  • अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन

👉 इससे मूड बेहतर होता है और तनाव कम होता है।


🔹 (e) दिनचर्या (Dinacharya) – अनुशासित जीवन

✔️ नियम:

  • ब्रह्ममुहूर्त में उठें
  • योग और ध्यान करें
  • नियमित समय पर भोजन
  • रात में जल्दी सोएँ

👉 नियमित दिनचर्या मन को स्थिर और शांत बनाती है।


🌸 3. वैदिक जीवनशैली के लाभ

  • मानसिक शांति और संतुलन
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
  • आत्मविश्वास और एकाग्रता बढ़ती है
  • गहरी नींद और सकारात्मक ऊर्जा

🔔 4. आज के समय में क्यों जरूरी?

आज का जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और भागदौड़ से भरा है।

👉 वैदिक ज्ञान हमें सिखाता है:
बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, आंतरिक शांति ही सच्ची सफलता है।”


🌼 5. अपनाने के आसान कदम

✔️ रोज़ 15 मिनट प्राणायाम
✔️ 10 मिनट ध्यान
✔️ सात्त्विक भोजन
✔️ मोबाइल से दूरी
✔️ सप्ताह में एक “Silent Time”


🌞 निष्कर्ष

तनाव को खत्म करने की शक्ति आपके भीतर ही है।
वैदिक तकनीकें केवल अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं।

जब मन शांत होता है, तभी जीवन स्पष्ट होता है।”


बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

30-दिनों की अच्छी आदतों की चुनौती ब्लॉग

 30-दिनों की अच्छी आदतों की चुनौती ब्लॉग

परिचय

30-दिनों की अच्छी आदतों की चुनौती का उद्देश्य जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। हर दिन एक छोटी-सी आदत अपनाई जाती है, जो धीरे-धीरे दिनचर्या का हिस्सा बनकर मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है। यह ब्लॉग पूरे 30 दिनों की यात्रा, अनुभव और सीख को दर्ज करता है।



सप्ताह 1: शुरुआत की नींव

दिन 1: आभार डायरी लिखें – तीन चीज़ें लिखें जिनके लिए आभारी हैं।


दिन 2: कम से कम 8 गिलास पानी पिएं।


दिन 3: 10 मिनट ध्यान या गहरी साँसों का अभ्यास करें।


दिन 4: 20 मिनट टहलें।


दिन 5: घर या कार्यस्थल का एक छोटा हिस्सा साफ़ करें।


दिन 6: सोने से 30 मिनट पहले मोबाइल/स्क्रीन बंद करें।


दिन 7: सप्ताह का अनुभव लिखें और एक सकारात्मक बदलाव नोट करें।

अनुभव: शुरुआती सप्ताह में छोटी-छोटी आदतें अपनाने से आत्मविश्वास और संतोष की भावना बढ़ती है।



सप्ताह 2: निरंतरता बनाना

दिन 8: सामान्य समय से 30 मिनट पहले उठें।


दिन 9: एक पौष्टिक भोजन तैयार करें।


दिन 10: तीन छोटे लक्ष्य लिखें।


दिन 11: एक भोजन बिना मोबाइल या टीवी के खाएँ।


दिन 12: किसी को सच्ची प्रशंसा दें।


दिन 13: 20 मिनट कोई प्रेरणादायक किताब पढ़ें।


दिन 14: सप्ताह का मूल्यांकन करें और देखें कौन-सी आदतें आसान लग रही हैं।

अनुभव: आदतें धीरे-धीरे दिनचर्या का हिस्सा बनने लगती हैं और आत्म-अनुशासन मजबूत होता है।



सप्ताह 3: विकास की ओर कदम

दिन 15: अपनी ताकत और उपलब्धियों को लिखें।


दिन 16: कोई नया व्यायाम या गतिविधि आज़माएँ।


दिन 17: एक घंटे का डिजिटल डिटॉक्स करें।


दिन 18: तीन दीर्घकालिक लक्ष्य लिखें।


दिन 19: किसी के लिए एक अच्छा काम करें।


दिन 20: आने वाले सप्ताह के लिए कार्य सूची बनाएँ।


दिन 21: सप्ताह की उपलब्धियों का जश्न मनाएँ।

अनुभव: इस सप्ताह आत्म-जागरूकता और आत्मविश्वास बढ़ता है। आदतें सोच और व्यवहार दोनों को प्रभावित करने लगती हैं।



सप्ताह 4: मजबूती और स्थिरता

दिन 22: सुबह सकारात्मक वाक्य (अफ़र्मेशन) बोलें।


दिन 23: 15 मिनट योग या स्ट्रेचिंग करें।


दिन 24: एक नया स्वस्थ व्यंजन पकाएँ।


दिन 25: किसी प्रियजन को धन्यवाद पत्र लिखें।


दिन 26: प्रकृति में समय बिताएँ।


दिन 27: अपने लक्ष्यों की समीक्षा करें और ज़रूरत पड़ने पर बदलाव करें।


दिन 28: अब तक की यात्रा से सीखी गई बातें लिखें।


दिन 29: तीन आदतें चुनें जिन्हें चुनौती के बाद भी जारी रखेंगे।


दिन 30: चुनौती पूरी होने का जश्न मनाएँ।

अनुभव: अंतिम सप्ताह में आदतें स्थायी रूप से जीवन का हिस्सा बनने लगती हैं। ध्यान केवल 30 दिनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लंबे समय तक सकारात्मक बदलाव की ओर बढ़ता है।



निष्कर्ष

30-दिनों की अच्छी आदतों की चुनौती यह साबित करती है कि छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। आभार, अनुशासन, स्वास्थ्य और आत्म-विकास पर ध्यान केंद्रित करके जीवन अधिक संतुलित और संतोषजनक बनता है। यह चुनौती अंत नहीं, बल्कि

 एक नई शुरुआत है – बेहतर और सकारात्मक जीवन की ओर।

सोमवार, 29 सितंबर 2025

गायत्री मंत्र के नाम और मानव जीवन में महत्व

 गायत्री मंत्र के नाम और मानव जीवन में महत्व

गायत्री मंत्र वेदों का सार और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। इसे वेद माता, ऋषि-मुनियों की साधना का आधार और मानव जीवन को दिशा देने वाला मंत्र कहा गया है। इसके अनेक नाम हैं, जो इसके विभिन्न स्वरूपों और महत्व को दर्शाते हैं।

गायत्री मंत्र के प्रमुख नाम

गायत्री मंत्र को अनेक नामों से जाना जाता है, जिनमें से प्रत्येक नाम इसकी विशेषता और महत्ता को प्रकट करता है:

  1. गायत्री – यह गायत्री छंद  में रचा गया है, इसलिए इसे गायत्री कहा जाता है।

  2. सावित्री – सूर्य देव (सविता) की उपासना का मंत्र होने के कारण इसे सावित्री कहा जाता है।

  3. वेद माता – चारों वेदों का सार होने के कारण इसे वेद माता कहा जाता है।

  4. गुरुमंत्र – वेदारम्भ संस्कार में गुरु अपने शिष्य को इस मंत्र का उपदेश देते हैं। आचार्य द्वारा शिष्य को दीक्षा देने के लिए के लिए इस मंत्र का प्रयोग किया जाता है, अतः इसे गुरुमंत्र भी कहते हैं

  5. मंत्रराज- यह मंत्र सभी मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। कुछ स्थानों पर इसे मंत्रराज भी कहा गया है।

  6. वेदमुखम्- गायत्री मंत्र वेदों का प्रमुख मंत्र होने के कारण इसे वेदमुखम् कहा जाता है।

  7. कामधेनु- गायत्री मंत्र सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है, इसलिए इस मंत्र को कामधेनु कहा जाता है।

मानव जीवन में गायत्री मंत्र का महत्व

1. मानसिक और आध्यात्मिक शांति

गायत्री मंत्र का जप मन को शांति और आत्मा को स्थिरता प्रदान करता है। यह व्यक्ति को ईश्वर से जोड़कर आत्मिक बल देता है।

2. ज्ञान और विवेक की प्राप्ति

इस मंत्र का सार है – हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। यह व्यक्ति को विवेकशील, सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण बनाता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

गायत्री मंत्र का उच्चारण वातावरण को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। इससे जीवन में उत्साह और उमंग बनी रहती है।

4. नैतिक और चारित्रिक विकास

यह मंत्र व्यक्ति को धर्म, सत्य और सदाचार की ओर प्रेरित करता है। इससे जीवन में नैतिकता और आदर्श स्थापित होते हैं।

5. स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन

मंत्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। इससे तनाव कम होता है और मानसिक संतुलन बना रहता है।

6. सामाजिक समरसता

गायत्री मंत्र केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में शांति, भाईचारे और सहयोग की भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

निष्कर्ष

गायत्री मंत्र के अनेक नाम हैं, और प्रत्येक नाम इसकी महत्ता को दर्शाता है। यह मंत्र मानव जीवन को आध्यात्मिक, मानसिक और नैतिक रूप से उन्नत करने वाला है। इसके नियमित जप और चिंतन से व्यक्ति आत्मिक शांति, ज्ञान, विवेक और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है। गायत्री मंत्र वास्तव में मानव जीवन को प्रकाश, सत्य और सदाचार की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है।

शनिवार, 7 मई 2022

शिवोsहम्


शिवोsहम्


यूं तो मनुष्य प्राणिजगत का सबसे बुद्धिमान प्राणी है।परंतु अन्य प्राणियों में बुद्धि के संस्कार मात्र उनके देह के पोषण और अस्तित्व के संरक्षण में समर्थ हो पाते हैं, जबकि मानव को मिली बुद्धि का परम प्रयोजन है कि वह बुद्धि को प्रबुद्ध करते हुए शिवोsहम् की प्रति पल की अनुभूति में समर्थ हो सके। हमारी इस मानवीय यात्रा का परम अवसान भी हिमालय के उत्तुंग शिखरों से लेकर मानसरोवर के पवित्र जल में देवाधिदेव महादेव के रुद्राभिषेक के पलों का स्वयं साक्षी बनने के मूल्यवान अवसर को  पाना है।हिमालय,मानसरोवर,रुद्राभिषेक, और साक्षीभाव ये अध्यात्म जगत के पारिभाषिक पद हैं।इनका योगसाधना में बहुत महत्व है।

शिव का अर्थ है कल्याण। इस कल्याण में जब आत्मा की सहभागिता होती है,तभी उसे आत्मकल्याण कहा जा सकता है। आत्मकल्याण के साथ ही सकल मानवीय प्रजा के कल्याण हेतु पथ का निदर्शन शिवत्व की परिभाषा है। यूं तो आज मानवीय बुद्धि के दुरुपयोग से न केवल यह भूलोक अपितु द्युलोक और अंतरिक्ष लोक भी बहुत अधिक त्रस्त और संतप्त हैं। लेकिन, बुद्धि में शाश्वत सत्ता के एकमात्र अधिष्ठाता  शिवतत्व का अवतरण ही इसका सार्वकालिक समाधान है।

हमारी बुद्धि में शिवत्व के आमंत्रण में यजुर्वेद की ऋचा की देशना ऋषि चेतना का सर्वश्रेष्ठ संज्ञान है।

शिवो भव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमंगिर:।

मा द्यावा पृथिवी अभि शोचीर्मा न्तरिक्षं मा वनस्पतीन्।। यजुर्वेद 11/45

मनुष्यमात्र के प्रति आत्मभाव और शिवतत्त्व के बीज मानवता की बुनियादी आवश्यकता है। हमारे  प्रत्येक विमर्श में हर मानव आत्मबन्धु हो और प्रत्येक मानुषी प्रजा के लिए शिवत्व के भावों का  उदयन सहजता से हो।

आज का विज्ञानवेत्ता मानव आकाश में कृत्रिम उपग्रहों की उड़ान से अंतरिक्ष की व्यवस्था में शांति भंग कर रहा है और चन्द्रलोक में उतरकर उपद्रव पैदा कर रहा है।बहरहाल,पृथ्वी पर हम स्वतंत्रता के बहाने महामारक बमों और अस्त्रों के निर्माण से महाविनाश को आमंत्रण नहीं दे रहे हैं क्या?क्या विज्ञान की खोज में शिवत्व मुख्य आधार नहीं होना चाहिए?

जिस इंसान को अभी तक पृथ्वी पर इंसानियत के साथ रहना नहीं आया है,क्या वह बिना शिवत्व के द्युलोक और अंतरिक्ष में पहुंच कर सर्वकल्याण की भावना का संकल्प कर सकता है?अवश्य ध्यान रहे कि हम में से न तो कोई सदा रहने वाला है,न ही हम में से किसी का सौंदर्य सदा बरकरार रहने वाला है।हमारा बल और यौवन भी सदा-सदा के लिए टिकने वाला नहीं है।फिर क्यों हम अपनी अनंत लालसा के कारण इस भूमि को अधिक नारकीय और संघर्षों के कारणों को पनपने में सहयोगी बन रहे हैं?हमारे लालच की सीमा सुरसा राक्षसी की भांति प्रति क्षण विस्तार के लिए बहुत आतुर है,जिस कारण हम अंतरिक्ष से भी पृथ्वी पर अंगारे बरसाने में लगे हए हैं।अपने लालच के वशीभूत हम सारी पृथ्वी की दिव्य वनस्पतियों को भी राख करने में तुले हुए हैं।कब होगा इस लालच का अवसान? सच तो बस,इतना है कि इन सबका एक ही समाधान है शिवो भव या शिवोsहम् ।

शिवोsहम् चेतना के निरंतर अहसास का नाम है।हर क्रिया में, हर प्रतिक्रिया में शिवत्व के दर्शन का नाम है शिवोsहम्।शिवोsहम् वह उपाधि है,जो समाधि की अनुगूंज को निरंतरता से व्यक्त करती है।

शिव मतलव परिस्थिति का गुलाम नहीं।शिव  की समाधि  मुद्रा बताती है कि समाधान बाहर की प्रतियोगिता से मिलने वाला नहीं है।यह तो अवेयरनेस और डिटैचमेंट की सहज अनुभूति के उच्च परिणाम से संभव है।

शिव की समाधि में आत्मचिंतन की मुद्रा बताती है कि हमें दैनिक जीवन में आत्मावलोकन को बहुत अधिक महत्व देना चाहिए।।शिव समाधि के अतिरिक्त जनसमान्य के कल्याण के साथ संतुलन और सामंजस्य के भी महाप्रणेता हैं।

भगवान शिव का वाहन नंदी( वृषभ) धर्म का प्रतीक है और भगवती पार्वती का वाहन शेर शक्ति का प्रतीक है।जीवन में सबसे बड़ी कला का नाम है संतुलन।संतुलन का अभाव ही संघर्ष का प्रमुख कारण है।वृषभ और सिंह परस्पर विरोधी हैं।शिव संतुलन के अद्भुत शिल्पकार हैं।शिव में  गजब का सामंजस्य है।शिव के कंठ में सर्पमाला है तो कार्तिकेय का वाहन मयूर है।गणेश का वाहन मूषक। मयूर सर्प का दुश्मन है, तो मूषक सर्प का  दुश्मन है।सबका स्वभाव विपरीत है। परन्तु भगवान शिव सामंजस्य के अद्भुत प्रस्तोता हैं। विपरीत परिस्थितियों में सामंजस्य ही एकमात्र ऐसा गुण है, जो सफलता के आस्वादन में प्रबल सहयोगी होता है।

समुद्र मंथन के समय में सभी देवों ने अमृत का पान  किया था और भगवान शिव ने विष का पान किया था।अमृत का पान करने वाले देव कहलाए और विष का पान करने वाले देवों के देव महादेव कहलाए।

शिव ने उस हलाहल को अपने कंठ में रख लिया। उसे गले के नीचे नहीं उतरने दिया। संसार के विष यानी दुख-कठिनाइयों को हमें अपने गले से नीचे नहीं उतरने देना चाहिए। हमें कठिनाइयों का भान तो हो, लेकिन हमें  उन्हें अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। नील कंठ सुंदरता का प्रतीक है।सबसे अधिक सौंदर्य परोपकार में होता है।

शिव के मस्तक पर चंद्रमा इस बात का प्रतीक है कि  हमें अपने मस्तिष्क को सदा शांत रखना चाहिए।जटाओं से निकलती गंगा का तात्पर्य है-सामर्थ्यवान का स्वयं पर नियंत्रण  और दूसरों के दुर्गुणों रूपी विष को सोखकर, ठंडे दिमाग से समाज और परिवार में सामंजस्य बनाए रखना है ।हमारा व्यक्तित्व ऐसा प्रखर हो कि गंगा जैसी जीवनदायिनी शक्तियां हमें स्वयं  प्राप्त हो जाए। 




      -डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा

विभागाध्यक्ष एवं संपादक वरेण्यम्

पूर्व संपादक जीवन संचेतना

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

मैं कौन हूँ



मैं कौन हूँ

मैं कौन हूं ? वास्तव में इस प्रश्न की जिज्ञासा  का कारण है- Know yourself.

Know yourself के लिए मैं कौन हूँ? पर आना ही पड़ेगा।

एक छोटी-सी कोशिश है - मैं जान सकूँ कि मैं कौन हूँ?इस प्रश्न की जिज्ञासा के लिए हमें मान्यता,विश्वास,विचारों की गठरी और अनुमान से परे अनुभूति की चरम गहराई में उतर कर ही खोजना होगा।

अनुभूति का यह क्षेत्र नितांत निजी क्षेत्र होता है।यहाँ धारणा नहीं अपितु सम्भावनाओं पर विशेष ध्यान देना होगा।

मैं कौन हूँ ? यह शब्दों का ज्ञान बढाने मात्र तक सीमित नहीं है,अपितु यह तो वास्तव में स्वयं को स्वयं से खोजना है।यह एक ऐसी महायात्रा है जहां स्वयं  को  स्वयं ही जानना है।

मैं इस विषय पर और आगे बढूं उससे पहले एक छोटी-सी कहानी से आपको रूबरू कराना चाहूंगा।

एकबार एक व्यक्ति अपनी फ्लाइट पकड़ने के लिए जैसे ही एयरपोर्ट पहुंचता है तो उसे वहाँ लंबी कतार दिखाई पड़ती है।वह उस कतार की परवाह किए बिना बोर्डिंग पास वाले काउंटर तक पहुंच जाता है और कहता है मुझे जल्दी है- अतः मुझे बोर्डिंग पास दे दें।काउंटर में बैठी महिला ने कहा -सर आप कतार से आएं।कतार के सभी पैसेंजर भी उसी फ्लाइट के हैं।यह सुनते ही वह व्यक्ति झल्लाते हुए बोलता है मुझे मेरा बोर्डिंग पास दे दीजिए।आप जानते नहीं मैं कौन हूँ।

उस महिला ने भी माइक हाथ में लेकर कतार में खड़े लोगों से पूछा कि आप लोग  बता सकते हैं क्या  कि ये कौन हैं।क्योंकि इन सज्जन ने अभी-अभी पूछा है -आप जानते हो मैं कौन हूँ?

ट्रस्ट मी।मुझ पर भरोसा कीजिए यदि हम यह जान जाते हैं कि "मैं कौन हूँ?" तो समझिए दुनिया की नब्बे प्रतिशत समस्या खत्म ।संसार के कई तरह के संघर्ष और राजनीति बहुत हद तक स्वतः खत्म हो सकती है।

आइए!पुनः इसी चर्चा की तरफ आगे बढ़ते हैं। मैं कौन हूँ?मेरी पहचान क्या है?

क्या मेरा नाम मैं हूं?

नाम हमारा साउंड से रिप्रजेंटेशन है। अतः नाम भी मैं नहीं हूं।

हमारी फोटो भी हमारा ग्राफिक रिप्रजेंटेशन ही है।अतः फोटो भी मैं नहीं हूं।

बेटा, पिता,मां ,बहन, गुरु आदि हमारी अलग -अलग भूमिकाएं हैं।अतः हमारे रोल भी मैं नहीं हूं।

डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर आदि तो प्रोफेशन है। अतः प्रोफेशन भी मैं नहीं हूं।

इंडियन, अमेरिकन आदि भी देश से बिलोंग होने के कारण है।अतः राष्ट्रीयता भी मैं नहीं हूं।

हिन्दू ,मुस्लिम, क्रिश्चियन आदि भी रिलीजन हैं। अतः रिलीजन भी मैं नहीं हूं।

क्या शरीर मैं हूं?परंतु जब कई बार शरीर का अंग कट जाता है तो भी बिना उस अंग के भी मुझे अपने मैं की अनुभूति होती है। यूँ भी शरीर तो भोजन का ही परिणाम है। अतः शरीर भी मैं नहीं हूं।

क्या मन मैं हूँ? नहीं  विचारों के बदलते रहने के कारण मन भी मैं नहीं हो सकता है ।

सत्य तो यह है कि मन जिसे ज्यादा याद करता है उसे ही स्वयं समझ लेता है।तभी तो कार के हिट होने पर दर्द , मोबाइल के खो जाने पर सब कुछ खत्म समझ लेता है।अतः मन भी मैं नहीं हूं।

मैं कौन हूँ ? जानने के लिए आसान पथ यह भी है कि मैं क्या नहीं हूं-इन बिंदुओं  पर  विचार करके भी हम अपने "मैं" की तलाश जारी रख सकते हैं।

हमारे सभी वेद और उपनिषद आदि शास्त्र आत्मा को "मैं "मानते हैं।यह शाश्वत सत्य भी है।

लेकिन  मैं आत्मा हूँ- क्या यह बोध इतना आसान है? यदि हां तो फिर शरीर में  चोट लगने पर और हमारे जीवन में दुःखों के आने  पर हमें दर्द क्यों होता है?क्योंकि आत्मा न तो मरता है और न ही उसे चोट पहुंचाई जा सकती है।जिस दिन शरीर पर लगी चोट से हमें दर्द और पीड़ा का अहसास नहीं होगा उसी दिन  से हमारा शरीर से डिटैचमेंट होना शुरू हो जाता  है। यह चेतना ही हमारी पहचान है।हमारा अस्तित्व अनौखा है, अद्वितीय है। किसी भी कालखंड में कोई हमारा डुप्लीकेट नहीं हो सकता है।यह ईश्वरीय सृष्टि की विशेषता है।हमें अपने यूनिकनेस के बोध तक पहुंचना है। 

इस बोध के लिए अवेयरनेस और डिटैचमेंट की सतत  आवश्यकता है।

मनोविनोद हेतु एक सामान्य कथानक से इसी बात को आगे बढ़ाता हूँ।एक बार भगवान इंसान से बहुत परेशान हो गया था।हर जगह इंसान पहुँच जाते थे अपनी -अपनी लंबी लिस्ट लेकर।किसी ने भगवान से कहा कि आप समुद्र में चले जाओ। वहां इंसान नहीं आपायेगा, तो किसी ने कहा कि पहाडों में चले जाओ,वहां इंसान नहीं आपायेगा।भगवान ने कहा इंसान इतना लालची है कि वह हर जगह आजाएगा। फिर किसी ने कहा भगवान आप इंसान के अंदर चले जाओ।इंसान वहां नहीं आसकता है।तब से भगवान इंसान के अंदर रहने लग गए हैं। कहानी  सत्य है या झूठी यह महत्वपूर्ण नहीं है।महत्वपूर्ण है ईश्वर मंदिर में नहीं मन के अंदर है।

अगर हमें सही में अपने मैं को जानना है तो हमें अपने अंदर की यात्रा करनी होगी।अंदर की यात्रा को बोलते हैं योग और बाहर की यात्रा को बोलते हैं प्रतियोग। प्रतियोग ही प्रतियोगिता की जननी भी है।

योग ही वह आधार है जो हम में अवेयरनेस और डिटैचमेंट के गुणों को उद्बुद्ध करता है।

वेद,उपनिषद, धर्म और दर्शन इसी प्रश्न के समाधान में नेति नेति कहकर  इसी अंतर्यात्रा का संकेत करते हैं।।यह जरूर प्रार्थनीय है कि हमें यह यात्रा अकेली ही करनी होगी।जिस दिन अस्तित्व की बुनियादी समस्या से ऊपर यदि सही अर्थों में "मैं कौन हूँ?" के प्रश्न में धार होगी और हमारी जानने  की इच्छा तीव्रतम होगी तो उस दिन "मैं कौन हूं?" के सारे रहस्यों  के प्रकटीकारण में कोई बाधा उपस्थित हो ही नहीं सकती है। और इसी प्रकटीकरण को शास्त्रों में आत्मबोध कहा गया है।




शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

क्या बनें हम? योगी या प्रतियोगी

 


क्या बनें हम? योगी या प्रतियोगी

योग शब्द के पहले उप जोड़ने से उपयोग और प्र जोड़ने से प्रयोग बनता है।साथ ही प्रति जोड़ने से से प्रतियोग बनता है।प्रति उपसर्ग प्रायः विपरीत अर्थ का द्योतन कराता है।प्रतियोग  के अर्थ के अवबोधन के लिए हमें शब्द की  विश्लेषणपद्धति की तरफ अग्रसर होना पड़ेगा।इसी पद्धति द्वारा हम 'उत्तर" शब्द के विपरीत अर्थ पर विचार करते हैं।हमें यह अवश्य जानना चाहिए कि शब्दजगत में विलोम की महत्ता सर्वविदित है। अतः उत्तर का विलोम पक्ष सदैव प्रश्न ही नहीं होता है अपितु "प्रति+उत्तर =प्रत्युत्तर"  भी होता है। यथा ध्वनि का विपरीत प्रतिध्वनि है। वैसे ही योग का विपरीत पक्ष है प्रतियोग।

योग का अर्थ जोड़ है।जुड़ने की प्रक्रिया का नाम योग है। योगदर्शन के भाष्यकार महर्षि व्यास योग का समाधि अर्थ ही स्वीकारते हैं।गीता तो योग को तपस्या और ज्ञान से भी अधिक श्रेष्ठ मानती है।आज सभी मानते हैं कि

योग करने वाला योगी कहलाता है।योग एक अंतर्यात्रा है।योग का विपरीत है प्रतियोग।प्रतियोगी मतलव बाहर की यात्रा करने वाला।प्रतियोग करने वाला प्रतियोगी अर्थात् बहिर्यात्रा करने वाला होता है

वस्तुतः प्रतियोग करने वाला ही प्रतियोगी होता हैऔर वही प्रतियोगी ही प्रतियोगिता में शामिल होता है।प्रतियोगिता अर्थात कम्पटीशन। लेकिन कम्पटीशन से वास्तविक अर्थ ध्वनित नहीं हो पाता है ।यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्र प्रायः कम्पटीशन की तैयारी करते हैं।यूनिवर्सिटी में उन्हें कंपीटिशन का सही अर्थ का ज्ञान कहां मिल पाता है?

हमारी यह प्रतियोगिता मां के पेट से बाहर निकलते ही,संसार में आते ही शुरू हो जाती है।प्रतियोगिता मतलव संघर्ष शुरू,द्वंद शुरू।द्वन्द मतलव राइवलरी ( Rivalry) अर्थात् प्रतियोगिता।अब किसके हिस्से में कितनी प्रतियोगिता आएगी?यह तय नहीं किया जा सकता है।न ही इसका कोई मानक है।लेकिन जिसकी जितनी बड़ी आकांक्षा,जितनी ज्यादा महत्वाकांक्षा, उसकी उतनी ही बड़ी प्रतियोगिता है।आजकल मनोविज्ञानी एक शब्द बोलते हैं-Sibling Rivalry. अर्थात सगे भाई-बहनों के बीच प्रतियोगिता। 

आज हम अपने आसपास यह बखूबी से देख सकते हैं कि सगे भाई-बहन ही आपस में ही द्वंद कर रहे हैं, प्रतियोगिता कर रहे हैं।बच्चों को भी होना होता है और उन्हें अपने जीवन में आगे भी बढ़ना है।साथ ही वे बड़े सपने भी देखने लगते हैं।परंतु उनके ये सपने समाज और परिवार की अपेक्षा के अनुसार ही होते हैं। 

बड़े सपने ही भविष्य में गलाकाट-प्रतियोगिता में बदलते हैं।गलाकाट शब्द का अर्थ प्रतियोगिता के संदर्भ में कब और कैसे शुरू हुआ है? यह जरूर शोध का विषय है।अपने इच्छित सपनों के लिए उपलब्ध वस्तुओं की संख्या सीमित है और उनके चाहने वालों की संख्या असीमित है।इसलिए एक-दूसरे का गला काटना ही पड़ेगा। इसे शाब्दिक स्वरूप में न लें। लेकिन हमारे मन में हिंसा के भावों के आए बिना सफलता का मिलना असम्भव-सा है।यह बात तो तय है। इस तरह से हमारे मन में और शरीर में हिंसा एकत्रित होती चली जाती है।लेकिन हमें यह पता ही नहीं चल पाता है कि कब से हमारे साथ यह सब घटित होने लगा है ? फिर यही हिंसा हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के विषैले केमिकल पैदा करती है।इन विषैले केमिकल को ही इमोशनल टोक्सिन कहते हैं।ये हमारे सिस्टम में शनैः-शनैः एकत्रित होने लगते हैं और हमारे सिस्टम को विकृत और रुग्ण करना शुरू कर देते हैं।

कालान्तर में यही हिंसा बेचैनी, घबराहट, भय, स्ट्रेस अवसाद, उदासी, डिप्रेशन आदि के भयावह रूप में तब्दील होती है। 

एक फ़िल्म आई थी, जिसमें इसे केमिकल लोचा कहा गया था।केमिकल लोचे का प्रभाव जब मन पर पड़ता है तो उससे मानसिक समस्याओं का जन्म होता है।यदि शरीर पर पड़ता है तो उससे स्ट्रेस से बनने वाली बीमारियां यथा हाइपरटेंशन, डायबिटीज आदि जैसी घातक बीमारियों का जन्म होता है। मेडिकल साइंटिस्ट उन्हें लाइफ स्टाइल डिजीज कहते हैं। 

इन मानसिक और शारीरिक बीमारियों के मूल कारण हिंसा का अभी तक मेडिकल साइंस में कोई इलाज उपलब्ध नहीं हो पाया है।जो इलाज है भी वह  शामक केमिकल्स के पिल्स के रूप में है या फिर शराब आदि के रूप में है। लेकिन इन शारीरिक और मानसिक बीमारियों के मूल कारण हिंसा के इलाज में योग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण  है। 

वैसे तो हमारे मन में हिंसा का जन्म होना ही नहीं चाहिए।लेकिन यदि हो भी

या है तो उसे हम बाहर कैसे निकालें? महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग इसी हिंसा से निबटने में सहायता करता है।इस अष्टांगयोग की आवश्यकता आज पूरे विश्व को है। विशेष करके उस समाज को जो अपनी हिंसा को शारीरिक श्रम के माध्यम से बाहर नहीं निकाल पा रहा है। उस साधनसंपन्न और वैभवपूर्ण समाज को इस अष्टांगयोग की आज बहुत आवश्यकता है।सबसे अधिक रुग्ण वर्ग यही है।अगर यह वर्ग रुग्ण न होता तो क्या यह अरबों-खरबों रुपए खर्च करता किसी को बर्बाद करने के लिए। इसलिए हमेशा से इस प्रतियोग का एक ही  उत्तर है योग।

सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु

स्मृति और कल्पना

  प्रायः अतीत की स्मृतियों में वृद्ध और भविष्य की कल्पनाओं में  युवा और  बालक खोए रहते हैं।वर्तमान ही वह महाकाल है जिसे स...