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रविवार, 9 मई 2021

स्मृति और कल्पना

 


प्रायः अतीत की स्मृतियों में वृद्ध और भविष्य की कल्पनाओं में युवा और बालक खोए रहते हैं।वर्तमान ही वह महाकाल है जिसे साधे बिना और जिसमें समाहित हुए बिना यथार्थ के दर्शन नहीं हो सकते हैं। वर्त्तमान में रहना और वर्त्तमान को जीना ही अच्छे स्वास्थ्य और आत्मजागृति की निशानी है।प्रायः हम देखते हैं कि अधिकतर लोग स्मृतियों में गोते लगा रहे होते हैं।मैं ऐसा था, मैं वैसा था।मेरे साथ ऐसा हुआ, वैसा हुआ अगैरह वगैरह।और कुछ ऐसे भी होते हैं जो सदा स्वप्निल दुनिया में डूबे रहते हैं।मैं यह बनूंगा तो मैं वह बनूंगा।जो वृध्द होगए हैं,वे अपने अतीत की स्मृतियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं।हमारे समय में ऐसा होता था।हमने कितने कष्ट सहे हैं, कितने दुख भोगे हैं तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो।स्मृति और कल्पना से पार हुए बिना वर्त्तमान में समावेश पाना असंभव है। समस्त आध्यात्मिक प्रक्रिया में वर्तमान की महत्ता सर्वाधिक है।वर्तमान की स्वीकार्यता से ही अस्तित्व बोध होता है।

यह सच है कि स्मृति और कल्पना ऐसे दो तत्व हैं जो हमें वर्त्तमान में उपस्थित ही नहीं होने देते हैं।लेकिन स्मृति और कल्पना से पूर्व यदि हम सेल्फ़ अवेयरनेस को प्राथमिकता दे दें तो स्मृति और कल्पना हमारे लिए संजीवनी बूटी का काम कर सकती हैं।आत्मजगरुकता का अर्थ है अपने अनौखे अस्तित्व को स्वीकारना ।अस्तित्व की प्रकृति कभी भी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती है।अस्तित्व का अर्थ है सत्ता का भाव।किसकी सत्ता?चेतना की सत्ता।जहां भी संकल्प है,पुरुषार्थ है, परिणाम की अभिलाषा है, वहां-वहां चेतना है, जीवन का प्रवाह है।

जीवन के प्रवाह को सतत गतिमान बनाए रखने के लिए आवश्यक है अपनी कल्पनाशीलता के पंखों को उड़ान भरने में चेतनापूर्ण प्रयासों को भरपूर् आदर देना।।धरा पर कोई भी सुप्रसिद्ध रचना हकीकत में आने से पहले कल्पना में ही प्रस्फुटित होती है। कल्पना को पंख मिलते हैं स्वयं पर भरोसे करने से।स्वयं पर विश्वास के उदित होने में कल्पना की ऊर्जा प्रवाहित होती है।विश्वास भी तुरंत फुरन्त वाली प्रक्रिया नहीं है।कई अड़चनों और अवरोधों से गुजरने पर ही विश्वास की मरुभूमि उर्वरा हो पाती है।कल्पना का अर्थ है मानसिक रचना।इस मानसिक रचना को ही आज ब्लूप्रिंट कहा जाता है।किसी मूवी की डायरेक्टर हो या फिर किसी पुल का इंजीनियर, किसी दवा के बनाने वाले वैज्ञानिक हों या फिर कथा-उपन्यास के लेखक, कोर्ट में पैरवी करने वाले वकील हों या फिर बिल्डिंग का नक्शा तैयार करने वाले आर्किटेक्चर हों, चाहे फैशन डिजाइनर हों या फिर बड़े-बड़े स्पीकर,टीचर, प्रोफेसर,आर्टिस्ट- सभी को इमेजिनेशन की पॉवर पता है।

वस्तुतः कल्पनाशीलता ऐसी जादुई छड़ी है, जो हमें दुख में सुखी और सुख में दुःखी रखने की क्षमता रखती है।कल्पनाशीलता का अर्थ है भविष्य को वर्तमान की आंखों से तराशने की क्षमता।कल्पना भी एक तरह की प्रतिभा ही।कल्पना के पीछे स्मृतियों के संस्कार भी मौजूद रहते हैं।अतीत की अनुभूति की अपनी अहमियत है।अतीत की स्मृति भी कल्पना को पंख देती है।स्मृति में आपकी कल्पना के उदाहरणों की भरमार से यह मूल्यांकन तो हो गया होगा कि कैसे अपनी इस अनौखी शक्ति के बदौलत कई अनेकों मुश्किलों से मुक्ति मिली है।स्मृति स्वयं पर विश्वास का कारण सकती है।इसके विवेक की बहुत आवश्यकता है।

विवेक का मतलव है (Conscienc) अन्तरात्मा की आवाज ।जो आपको अंदर से सदा जागृत रखे ,आपका मार्गदर्शन करें।व्यक्ति सही-गलत,अच्छे-बुरे, सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय तथा यश-अपयश आदि द्वंद्वों से मुक्त कर स्वयं के अस्तित्व बोध की प्रकृति से परिचित हो सके। अपने अस्तित्व की अनुभूति का अर्थ है स्वयं की सत्ता को स्वीकारना

आज के धार्मिक क्रियाकलापों में ईश्वरीय सत्ता का उपदेश हद से ज्यादा सुनने को मिलता है, भले ही ईश्वर उन उपदेशकों से ईश्वर कोसों दूर क्यों हो ?ईश्वरीय सत्ता से पहले यदि स्वयं के अस्तित्व का बोध नहीं हैतो फिर यह सब एक नशे जैसे ही है।वह सब पर थोपना चाहता है। जो मैं करता हूं ,वही ठीक है।अपने सिवा कोई भी उसे कोई भी ठीक नहीं जंचता है। सब में उसे खामियां ही खामियां नजर आती है।सबको सुधारने में लग जाता है।भूल जाता है कि उसके इस सुधारने के क्रम में वह टोंट कस रहा होता है।इसे लोगों को ठेस भी पंहुच रही है।सुधार से पहले वह स्वीकार हो। स्वीकार्यता का अर्थ है मानवीय गरिमा सर्वोपरि

-डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा 




 

 

शनिवार, 8 मई 2021

THE HOPE EXPERIMENT : आशा परमं ज्योतिः निराशा परमं तमः




हावर्ड
यूनिवर्सिटी के 
विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने 1950 के दशक में चूहों पर एक शोध किया था। कर्ट ने एक शीशे के जार  को पानी से पूरा भर दिया और उसमें एक चूहे को डाल दिया।चूहा उस पानी से भरे शीशे के जार में गिरते ही हड़-बड़ाने लगा था।चूहे ने जार से बाहर निकलने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। परंतु थोडे समय तक अपना पूरा जोर लगाने के बाद चूहे ने अपने हथियार डाल दिये थे और वह उसी जार में डूब कर मर गया

कुछ समय के बाद कर्ट ने अपने शोध में थोड़ा-सा बदलाव कियाकर्ट ने एकबार फिर से पानी से भरे उस शीशे के जार में एक दूसरे चूहे को डाल दिया।वह चूहा भी उस शीशे के जार से बाहर आने के लिये बहुत ज़ोर लगाने लगा।लेकिन जैसे ही उस चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द किया तो वैसे हि वह चूहा उस जार में डूबने लगा।ठीक तभी कर्ट ने उस चूहे को जार से बाहर निकाल लिया।अगर कर्ट उस चूहे को जार से बाहर नहीं निकालते तो वह चूहा उसी जार में डूबकर  मर जाता।जार से बाहर निकालने का अर्थ है कि अब चूहा मौत के मुंह से बाहर आचुका था। कर्ट ने चूहे को बाहर निकाल कर उसे अपने हाथ से सहलाया। 

कर्ट ने कुछ समय तक उस चूहे को पानी से भरे शीशे के जार से दूर ही रखा,लेकिन थोड़ी देर के बाद उस चूहे को कर्ट पुनः उसी जार में फेंक दिया। पानी से भरे उस जार में दोबारा फेंके गए चूहे ने फिर से जार से बाहर निकलने के लिए अपनी भरपूर कोशिश शुरू कर दीलेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के बाद अब उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर कर्ट  स्वयं भी बहुत  हैरान हो रहे थे । 

कर्ट ने तो सोच था कि अब यह चूहा मुश्किल से पंद्रह-बीस  मिनट तक ही संघर्ष कर पाएगा और फिर उसकी अपनी शारीरिक क्षमता जवाब दे जाएगी।और वह उसी जार में डूब जायेगालेकिन जैसा कर्ट ने सोचा वैसा कुछ भी नहीं हुआचूहा जार में तैरता रहा और अपने जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।साठ घँटे तक चूहा पानी से भरे जार में अपने स्वयं को बचाने के लिये पूरी तत्परता से सँघर्ष करता रहा

कर्ट यह सब देखकर बहुत ज्यादा आश्चर्य में पड़ गए थे।पहले वाला चूहा तो मात्र 15 मिनट में ही परिस्थितियों के सामने अपने  हथियार डाल चुका था ।जबकि  यह दूसरा चूहा साठ  घँटे से उन विषम परिस्थितियों से जूझ रहा था।वह किसी भी कीमत पर अपनी हार मानने को तैयार नहीं थाकर्ट ने अपने इस शोध क नाम"THE HOPE EXPERIMENT'रखा था।" HOPE = यानी आशा

कर्ट ने अपने इस शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा कि जब उस चूहे को पहली बार जार में फेंका गया था तो वह डूबने की कगार पर पहुंच गया था । बस, उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया था।जिससे उसे नवजीवन मिल गयाउस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का नवसंचार हो गया था।जिससे उसके अनुभव में जीवन के प्रति विश्वास के प्रबल भाव पैदा हो गए थे। उसके अंतर्मन में एक विश्वास बैठ गया था कि कोई  एक हाथ है,जो विकटतम परिस्थिति से उसे बाहर जरूर  निकालेगा।इसी प्रबल विश्वास के चलते ,जब उसे जार में फिर से फेंका गया तो वह साठ घंटे तक अनवरत संघर्ष करता रहा था।इस सबके पीछे कारण था एक ऐसे अनौखे हाथ के प्रति विश्वास, जिसने उसे विषम परिस्थिति में जीवनदान दिया थावजह थी एक वह आशावजह थी एक वह उम्मीद जो उसे बड़े-से-बड़े संकट से जरूर बचाएगी  । 

जीवन में कैसी भी परीक्षा की घड़ी क्यों न आजाए, कैसी भी विपरीत परिस्थिति क्यों न आजाए,लेकिन कभी हार नहीं माननी चाहिए।भले ही सारी उम्मीदें खत्म होती नजर आरही हों, लेकिन तो भी उम्मीद बनाए रखनी चाहिए।उम्मीद की किरणों से ही हम सब समस्याओं को परास्त कर सकेंगे।साथ ही संघर्षों में विजेता बन कर उभर सकते हैं। कभी भी अपने सांसों की डोर को टूटने मत दीजियेमन को हारने मत दीजिये।याद रखिए मन के हारे हार और मन के जीते जीतजिस हाथ ने हमें इस पानी के जार में फेंका हैवही हाथ हमें इस पानी के जार से सकुशल वापिस निकाल भी लेगाउस हाथ पर विश्वास रखिएजिसने जीवन दिया है वही जीवन भी बचाएगा ।बस,इस विश्वास पर कायम रहिए कि आशा परमं ज्योतिः निराशा परमं तमः । 

-डॉ.कमलाकान्त बहुगुणा

 

सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु

स्मृति और कल्पना

  प्रायः अतीत की स्मृतियों में वृद्ध और भविष्य की कल्पनाओं में  युवा और  बालक खोए रहते हैं।वर्तमान ही वह महाकाल है जिसे स...